वो-प्यार की अभिव्यक्ति

तुम्हारे घर के नीचें खड़े खड़े आधे घंटे से ऊपर हो गया मुझे तुम्हारा इंतज़ार करते करते, पर साहब हैं कि आने का नाम ही नहीं लेतेे। कौन कहता है कि बस लड़किया ही देर लगती हैं तैयार होने में? वो सब लोग अभी ‘इन’ से मिले नहीं हैं। मैं मन ही मन हँस दी। दो-तीन बार गाड़ी का हॉर्न बजाया, तब जाकर तुम नीचे आते हो।

जैसे ही कार के अंदर दाखिल होते हो, मुझे हँसता देख कर तुम अपनी भौए चढ़ाकर रूठ के बोलते हो,”हो गया महारानी का हँसना तो अब चले?”

“जी बिल्कुल”, मैं भी हँस देती हूँ और कार हवा से बातें करने लगती हैं। मेरे यू हँसने पर तुम हर बार रुठ जाया करते और मैं मनाती भी नहीं तुम्हें। जानती हूँ ये झूठ मूठ का रूठना तुम्हारा। तुम्हें कार चलाना तब तक पसंद हैं, जब तक मैं साथ नहीं हूँ, जब मेरे साथ होते हो तो मैं साहब की ‘ड्राइवर’ बन जाती। हर बार कोई न कोई तरीके से मैं तुमको सताती और तुम चिढ़ जाया करते, लेकिन मुझसे मिलने की खुशी तुम्हारा चेहरा बयां कर देता। तुम कार में दाखिल होते हो और मेरी नज़र तुमपर से हटने का नाम नहीं ले रही। मन तो कर रहा था कि कार बाद में चलाऊ, पहले जी भर के तुम्हें देख लू।

ग़ज़ब लग रहे थे तुम, काले रंग के ट्रॉउसर के साथ काले रंग की कमीज़ में। ऐसा लग रहा था कि अमावस की रात में चाँद निकल आया हो। तुम्हारे इस गोरे रंग की मैं हमेशा तुम्हें उलाहना देती और तुम्हें चिढ़ाने के लिए अक्सर कहती कि तुम “सफ़ेदी से भरी बाल्टी में गिर गए थे बचपन में इसलिए इतने गोरे हो” और हँसने लगती। पर मेरे गेहुँए रंग के लिए तुमने कभी मज़ाक में भी मुझे कुछ नहीं कहा कभी। तुम्हें निहारते हुए गाड़ी चलाना तो मेरे लिए आम बात थी, पर आज तुम कुछ ज़्यादा ही अच्छे लग रहे हो। गाड़ी चलाते हुए सड़क पर काम और तुम्हें ज़्यादा देखे जा रही हूँ।

गेअर से हाथ हटाकर हौले से अपने हाथ को तुम्हारें हाथ पर रखकर सहलाती हूँ फिर तुम्हारें हाथ को अपने गालो पर लगाकर धीरे से तुम्हारी हथेली चूमती हूँ। तुम शर्मा जाते हो और तुमसे ज़्यादा मैं। फिर तुम्हारें की उंगलियों में अपनी उंगलिया फंसा कर तब तक नहीं छोड़ती जब तक गेअर ना बदलना पड़े। धीमीं हवाएं चलती रहती हैं और मैं तुम्हारें ख़यालों में खोई रहती हूँ और तुम मेरे चेहरे पर आ रहे मेरे बालों को हटा कर, करीने से मेरे कान के पीछे करते हो। और मुझे, तुम्हारें दिए हुए झुमकों को पहना देख तुमने ख़ुशी से कहा,”तो आख़िर तुमने पहन ही लिए झुमके”।
मैंने भी बिना तुम्हें देखे बस हौले से मुस्कुरा के हॉमी भर दी पर कुछ कहा नहीं। शर्म से लाल हुए जा रहीं थी, बोलती भी कैसे? मुस्कुराता देख तुम मुझे सवालों भरी नजरों से देखते हो। “मैं चाहती थी कि जब भी मैं ये झुमके पहली बार पहनू, तुम्हारें सामने ही पहनू। तुम भी देखना चाहते थे कि ये मुझपर जांचते हैं या नहीं’।

“ऐसा कबसे सोचने लगी तुम कि मेरे सामने ही पहले पहनोगी ये झुमके?”

“अच्छा!!! तो फिर पिछले 6 महीनों में ये काली कमीज़ क्यों नहीं पहनी? और जब मुझसे मिलना हुआ आज, तब ही पहने हो?”

तुम मेरे तर्कों पर मुस्कुरा कर कहते हो,”तुमसे कोई नहीं जीत सकता” और मैं भी हँस देती हूँ। तुम्हारे बाएं गाल पर जो काला तिल हैं, उसे जब जब देखती हूँ मन करता हैं कि उसे चूम लू, पर अभी कहाँ वो वक़्त हैं, कहाँ वो जगह?

मैं तुम्हें निहारने में इतनी मशरूफ थी कि पता ही नहीं चला कब लाल बत्ती हरी हो गई। मैं इतनी खोई हुई थी कि गाड़ियों के हॉर्न मेरे कानों में पड़े तो ऐसा लगा मानों मेरी निद्रा-भंग हुई हो। मैंने गाड़ी को रफ्तार दी और हमारी बातों को भी। बातें करते करते मेरी किन्ही बातों पर तुम बेबाकी से हँस दिया करते और मैं भी तानाकशी से बाज़ नहीं आती। जब तुम्हें कोई जवाब नहीं सूझता तब मुझे चिढ़ाने और गुस्सा दिलाने की भरसक कोशिश करते हो तुम। उफ्फ !!! तुम्हारा ये बचपना।

बातों में इतने खोए हुए थे हम कि पता ही नहीं चला हम मंज़िल पर कब पहुँच गए। सूरज डूबने में अभी थोड़ा वक्त था इसलिए हमने कार से उतर कर थोड़ी देर टहलने का फैसला किया। वादियों में लिपटा हुआ हरा भरा मैदान! इसकी खूबसूरती अक्सर लोगो को आकर्षित करती। सूरज की रौशनी से छोटे छोटे पौधें ऐसे लग रहे थे जैसे किसी ने ज़मीन पर सुनहरी चादर ओढ़ा दी हो। हल्की ठंडी हवाओं से पेड़ो का लहलाहना और फूलों की मीठी सी खुशबू और ये खुशगवार मौसम इस वादी को और खूबसूरत बना रहे थे। लग रहा था जैसे किसी ने इस जगह रोमानियत का इत्र छिड़क दिया हो। हवा का रुख देखकर मैंने जुड़ा बांध लिया, पर तुम बेचारे क्या करते। तुम्हारें बाल ना तो मेरे जितने लंबे थे कि तुम बांध सको न इतने छोटे थे कि तुम्हें कोई फर्क ना पड़े। मुझसे बातें करते करते अपने बालों को चेहरे से हटाने कि नाकाम कोशिश करते हुए तुम थककर मेरी मदद लेते हो।

तुम्हारें कोमल बालों पर अपने हाथों को फेरते हुए हल्के से सहलाने लगी और पता नहीं खुली आँखों से क्या क्या सपने देखती रही। “अब चोटी डालोगी क्या?” तुमनें कहा।

“हुह!!! भागों तुम। धरम करो, धक्का खाओ”, मैंने चिढ़कर जवाब देते हुए तुम्हें धक्का दिया।

“आय लव यू !!!”, तुमनें बहुत प्यार से मेरे बालों को जुड़े से आज़ाद करते करते कहा।

मैं शर्मा के मुस्कुरा दी और अपने बाल फिर से बांधने लगी। फिर हम वहाँ से उठ कर टहलने लगे। बिना कुछ बोले तुमने हौले से मेरा हाथ थाम लिया और चलने लगते हो। बीच बीच में मेरे चेहरे पर आते बालों को मुझे हटाता देख हँसने लगते, बिल्कुल किसी शरारती बच्चे के जैसे।

इस वादी में समय कैसे बीत जाता हैं पता ही नहीं लगता। ऐसे हसीन मौसम में अपने प्यार का हाथ थामे टहलना, हाथ मे हाथ डाल कर बातें करना, सब एक सपने जैसा लगता हैं। शाम होते ही परिंदों के काफिले का अपने घरों को लौटना, नीले बादलो का सुरमयी हो जाना और ठंडी हवाओं के साथ सूरज डूबते देखना, इन सब को और खूबसूरत बनाता हैं तुम्हारा साथ।

तेज़ हवाओं के साथ मेरे दुपट्टे को संभालना भी मुश्किल था कि तुमने मेरी लटों को जुड़े से आज़ाद कर दिया। “ये क्या कर रहे हो?” मैंने झुंझलाहट में पूछा।

“कुछ भी तो नहीं” तुम हँसने लगे।

“तुम नहीं सुधरोगे हैं ना?” मैंने नाराज़गीे से कहा।

“तुमको लगता हैं ऐसा हो सकता हैं” तुमने मुस्कुराकर कहा और मेरा दुपट्टा मुझें ओढ़ा दिया। मुझे अपनी बाँहों में भर लिया और ना जाने कितनी हम देर यूँही खड़े रहे। कुछ देर बाद तुमने मेरे माथे को बड़े प्यार से चूमकर कहा “मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ”।

मैं मुस्कुरा के तुम्हारी आँखों में आंखे डाले बस देखती रहती हूँ, फिर शरमा के तुमसे गले मिल जाती हूँ। इतना इत्मिनान और सुकून कही नहीं। अंधेरा होने को था और अगली सुबह तुम्हें वापस दिल्ली रवाना होना था, सो हम लौट आए। तुम्हारें घर दाखिल होकर तुम अपने बैग में ज़रूरी सामान भरने लगे औऱ फिर हम रात के खाने के लिए निकल गए। हमने बहुत अच्छा वक़्त बिताया और हम वापस आ गए।

मुझे कार पार्किंग में लगाते देख तुमने पूछा “आज वापस घर नहीं जाओगी क्या?”

“आज नहीं, काल सुबह 6 बजे की ट्रेन हैं ना सो तुम्हें ट्रैन में बैठकर जाऊँगी”

“हे भगवान !! ये लड़की पीछा ही नहीं छोड़ती मेरा” ये कहकर तुमने मुझे गले लगा लिया।“छोड़ना भी नहीं कभी!! प्लीज्” तुमने उदास होकर कहा।

“हाँ पागल, अब उदास मत हो” ये कहकर मैं तुमसे अलग हुई और दरवाज़े को खोलने लगी। “अरे यार!! मैं फ़ोन तो कार में ही भूल आई। तुम ला दोगे प्लीज्, ?” मैंने बहाना बनाया।

“जी मैम” और तुम नीचे चले गए।

तुम जब ऊपर आए तो पूरा अंधेरा था और जैसे ही तुम घर के अंदर दाखिल हुए, पूरा कमरा रौशनी से जगमगा उठा। तुम्हारा चेहरा देखने लायक था। तुम स्तंभ थे पर चेहरे पर खुशी साफ़ झलक रही थी। मैं तुम्हारा हाथ पकड़ कर तुम्हें लेकर चल रही थी। गुलाब की पंखुड़ियों की पगडंडी और किनारे पर भीनी पीली सी रौशनी फैला रही मोमबत्तियों की कतारें और कमरे की दीवारों पर लाइट्स से सजावट। कमरा पर कर के हम बालकॉनी में दाखिल हुए जहाँ एक टेबल पर गुलाब के फूलों का गुलदस्ता रखा हुआ था और पूरा घर खुशबू से सना हुआ था।

“ये सब कब? कैसे? किसने? क्यों?” तुम सवालों की लड़ी लगा रहे थे।

“जब हम वादियों में टहल रहे थे तब हमारे दोस्तो ने ये सब किया। मैंने कहा था उनसे ऐसी तैयारी करने के लिए। क्या हुआ ? पसंद नहीं आया क्या सरप्राइज?” मैंने पूछा।

“कैसी बातें कर रही हो यार” ये कहकर तुम मेरे गले से लग गए। तुम्हारी आँखों में आँसू थे, खुशी के।
मैंने तुम्हें गुलदस्ता पकड़ाया और तुम्हें अपनी आँखें बंद करने के लिए कहा।
“अब खोलो अपनी आँखें”
मैं तुम्हारें सामने अपने घुटनों पर बैठी थी।
“मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ। ना पहले कभी बता पाई और पता नहीं कि बाद में कब इतना वक़्त मिले। इसलिए सब अभी कहना चाहती हूँ। मैं चाहती हूँ कि कल जब तुम यहाँ से जाओ तो मेरे होकर जाओ औऱ मुझे अपना बनाकर। हमेशा हमेशा के लिए। आय लव यू लक्ष्य।”
“आय लव यू टू पागल” तुमनें अपने आँसू पोछते हुए कहा।
मैंने तुम्हारी उंगली में एक छोटा सा नट डाल दिया।
“ये क्या हैं पागल?” तुमनें हँस के पूछा।
“अच्छा !! तो अब साहब को हीरे की अंगूठी चाहये?” दोनों हँस दिए।
एक मैकेनिकल इंजीनियर को प्रोपोज़ करने का इससे बेहतर तरीका नहीं था मेरे पास। तुमने मुझे गले लगा लिया। फिर हम झूले पर बैठ गए और मैं तुम्हारें कंधे पर सर रख के तुमसे बात करते करते कब सो गई पता ही नहीं चला।
सुबह तुम्हारी आवाज़ से नींद खुली। तुम हाथ मे 2 कप चाय लिए खड़े थे। मुझे चाय थमाते हुए तुमनें मेरे माथे को प्यार से चूमा और मेरे साथ झूले पर बैठ गए।
मैंने चाय की चुस्की लेते हुए कहा,”ऐसी चाय रोज़ पिलाओगे?”
“हाँ अगर तुम रोज़ ऐसे ही मेरे साथ रहोगी” और मेरे सिर पर हाथ फेरने लगे।
“ओह्ह गॉड!!! वक़्त क्या हो रहा हैं? तुम्हारी ट्रैन छूट जाएगी। मुझे उठाया क्यों नहीं तुमने, चलो अब जल्दी करो” मैं परेशान हो गई।
“शांत हो जाओ” तुमने मुझे पकड़ कर बैठाया। “मैं नहीं जा रहा। एक दोस्त को आज दिल्ली जाने की ज़रूरत थी और मुझे तुम्हारी। सो मैं कुछ दिन और यहाँ रुकना चाहता हूँ। तुम्हारें साथ, तुम्हारें पास रहकर।”
मैं खुशी से तुमसे लिपट गई। हमने काफी अच्छा वक़्त बिताया और अगले दिन हम फिर से उसी मैदान में टहलने गए, जहाँ तुमने मुझे दुनिया की सबसे खुशनसीब लड़की होने का एहसास दिलाया। सूरज ढलने को था और तुम मुझे मैंदान के पास एक टीले पर ले आये जहाँ से सब कुछ बहुत खूबसूरत लग रहा था।
“क्या तुम मुझसे शादी करोगी?”
“हाँ करूँगी। और मैंने भी कल तुमसे यही पूछा था”
“जानता हूँ। बस जवाब दो मुझे, करोगी मुझसे शादी?”
“हाँ करूँगी?” और तुमने मेरी उंगली में नट नहीं पर एक असली अंगूठी पहना दी।
“आज से तुम सिर्फ मेरी” ये कहकर तुमने मुझे गले से लगा लिया।
सब कुछ वही था। वही वक़्त, वही जगह, वही हसीन मौसम, वही तुम और वही मैं। ठंडी हवाओं का चलना, मेरे दुपट्टे का मुझसे ना संभल पाना और मेरे बालों का हवा में उड़ना। एक दूसरें का हाथ थामे टहलना और पंछियों का फिर अपने ठिकानोंं को लौटना। इन सब से ऊपर था मुझे अपना ठिकाना मिलना और मेरा ठिकाना तुम्हारें सिवा और कहाँ? कुछ बदला था तो बस मेरी ज़िंदगी।
©SrishtySharonpeople-2567022_1280

 

Meeting the Soulmate

It was already 6 in the morning. I was desperately waiting for the Rajdhani express coming from Delhi to Nagpur. The train was almost late by an hour. I picked my helmet, get my backpack and headed for platform no 3. Many trains came and go, except the one, my Love was boarded on. I waited and waited. We call and text each other to figure out the location of the train. My cellphone flashes, I saw his message, informing me the train has started from the outer and is about to reach to the main station.

A few minutes later, I saw the train. When it started to slow down, I desperately searched for his boogie. And when I finally found it, I saw him get off the train, anxiously looking here and there, calling someone. His eyes were searching for me. Suddenly my phone rings, but I didn’t pick up. I saw his innocent face, excitement turning into sadness. And just when he took away his eyes from the phone, he saw me heading towards him and his arms wide open to hug me. We hugged for half a minute. We were staring at each other, smiling.

Suddenly he said,”You are looking hot.” I blushed and said,”huh, kuch bhi.” Back of the mind, I was thinking, how come I could look hot, in my regular denim and a hoodie, with no makeup on my face. I laughed at myself. He asked,”what happen?”. “Nothing”, I said. Then we talk and talk. I handed him a pack of his favourite chips and, he handover me a carry bag. Inside it was his T-shirt. I have asked him to bring one of his T-shirt for me.

I don’t know, how 15 mins passed and the train gave the signal for the departure. We hugged again, I kissed him on his neck. My tall guy boarded on the train. We waved bye and he remained standing on the door of the train until I disappear. I left the station with a heavy heart, but I was so satisfied that I got to meet my love. Really!! First meet is always special. I came out of the station, get on my scooty and headed home. While driving I was getting lots of notifications. I knew it was him.

I reached home and saw his messages. I saw a T-shirt, a bundle of 10 rs notes and a very cute little box. When I opened it, I couldn’t stop my tears. I never felt so special in my whole life. I was overwhelmed. Inside the box was a set of “Jhumkas”. Red and golden combination makes it very pretty. It wasn’t the end of the surprise. I saw 3 earrings, each of different colours, exactly the same colours I like. I couldn’t stop my tears. That was the best surprise, the best gift I could ever get. He was nervous about his choices, but I know how special and beautiful was that. That day I realized that He is the ONE. Only he can make me happy with small gestures. That day I met my soulmate. Because at that point, I knew, he Loved me more than he claims.